प्रतिरोध के संस्कृतिकर्म के प्रतीक विद्याभूषण द्विवेद्वी – अनीश अंकुर

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विद्याभूषण द्विवेद्वी

अठारह वर्ष पूर्व राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली में एक नाटक के रिहर्सल के दौरान रीढ़ की हड्डी में विद्याभूषण द्विवेद्वी को चोट लग गयी। उस वक्त वे वहां द्वितीय वर्ष के छात्र थे। स्पाइनल कॉर्ड में इस चोट के कारण उन्हें लगभग ढाई महीने तक दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में रहना पड़ा। इस चोट से विद्याभूषण उबर नहीं पाए और अंतत: 27 नवम्बर, 1996 को उनकी मौत हो गयी। मृत्यु के वक्त विद्याभूषण की उम्र मात्र 28 वर्ष थी।

आज के नये रंगकर्मी विद्याभूषण द्विवेद्वी से शायद ही भली-भांति परिचित हों। वे एक अभिनेता, निर्देशक, नाटककार व संगठक होने के साथ-साथ पत्रकार भी थे। लगभग एक दशक तक वे पटना रंगमंच के नेतृत्वकारी रंगकर्मियों में से एक रहे। रंगकर्म की एक्टीविस्ट परंपरा से आते थे विद्याभूषण द्विवेद्वी। रंगकर्म उनके लिए कैरियर नहीं बल्कि आम लोगों के दु:खदर्द से संवाद का माध्यम रहा। उस समय उनको जानने वाले कला के हर अनुशासन व समाज के विभिन्न क्षेत्रों में मौजूद थे।

अपनी मौत से पूर्व लगभग एक दशक तक वे पटना के रंगजगत व संस्कृतिकर्म से बेहद गहरे जुड़े थे। पटना की सुप्रसिद्ध रंगसंस्था प्रेरणा (जनवादी सांस्कृतिक मोर्चा) को पुष्पित- पल्लवित करने का श्रेय विद्याभूषण को जाता है। अपनी संस्था के अलावा बाहर के साझा सांस्कृतिक कारवाईयों में वे हमेशा बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे। जिन नाटकों में उन्होंने अभिनय किया उसमें प्रमुख है राजेंद्र मंडल लिखित हस्तक्षेप, डेढ़ बीघा जमीन, तिनके भी चीखेंगे इत्यादि। उनके द्वारा निर्देशित नाटकों में प्रमुख है ‘मारीच का एक और संवाद’, हार्वड फास्ट का मशहूर नाटक ‘आदि विद्रोही स्पार्टाकस’, बतरेल्त ब्रेख्त का ‘गैलीलियो’, ‘पूर्वाद्ध’ आदि।

इसके अतिरिक्त दर्जन भर से अधिक नुक्कड़ नाटक उनके निर्देशन में तैयार कराए गए। 1986 में स्थापित ‘प्रेरणा’ तीन-चार वर्षो के भीतर, विद्याभूषण की नुमाइंदगी में, पटना रंगमंच के मुख्यधारा का संगठन बन गयी। बहुत सारे युवाओं को उन्होंने रंगमंच से जोड़ा। रंगमंच फिल्मों और टेलीविजन में जाने का महज माध्यम भर नहीं बल्कि सामाजिक बदलाव का, एक बेहतर दुनिया बनाने की संभावना जीवित रखने का भी सशक्त माध्यम है।

जब 1989 में एक जनवरी को सफदर हाशमी की हत्या हुई, विद्याभूषण उस हत्या के विरुद्ध प्रतिरोध आंदोलन खड़ा करने वाले अगुआ लोगों में थे। हर वर्ष जनवरी के पहले सप्ताह और 12 अप्रैल को पटना में सफदर की याद में आयोजन होते हैं। जन नाट्य मंच, नई दिल्ली (सफदर हाशमी की संस्था) के बाद पूरे उत्तर भारत में पटना एकमात्र शहर हैं जहां सफदर की स्मृति में हर साल बिला नागा समारोह होता रहा है। इसकी शुरुआत और इसे निरंतरता प्रदान करने का श्रेय विद्याभूषण द्विवेद्वी को जाता है। सफदर हाशमी की हत्या को केंद्र में रखकर लिखा गया उनका नाटक ‘एक्सीडेंट’ काफी मशहूर हुआ। उस्ताद-जमूरा के फॉम्रेट में लिखे गए इस नाटक के सैकड़ों प्रदर्शन पटना और बिहार के दूसरे क्षेत्रों में किए गए।

विद्याभूषण सीवान जिले के एक गरीब परिवार में जन्मे थे। पटना में वे ट्यूशन पढ़ाकर अपना गुजारा करते थे। कदमकुआं स्थित सर गणोश दत्त पाटलिपुत्र से पढ़ाई करने वाले विद्याभूषण द्विवेद्वी ने रंगमंच की दुनिया में तेजी से अपना मुकाम बना लिया। प्रेरणा में रहने के दौरान ही उन्होंने पत्रकारिता भी शुरू की।

पटना से निकलने वाले ‘नवभारत टाइम्स’ में वे सांस्कृतिक प्रतिनिधि के बतौर भी खासे चर्चित हुए। लगभग तीन वर्षों तक नवभारत टाइम्स की नौकरी की। ‘नवभारत’ के बंद होने के बाद उन्होंने ‘आद्री’ से निकलने वाली पत्रिका ‘सुबह’ में भी कुछ दिनों तक काम किया। लंबे कद व गौर वर्ण के विद्याभूषण सम्मोहक व्यक्तित्व के स्वामी थे। सभी उनसे जुड़ते, उनके करीब होना चाहते।

1995 में उन्होंने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली के लिए आवेदन किया। पत्रकारिता की वजह से वे लगभग तीन वर्षों से रंगमंच से दूर थे फिर भी पहले ही प्रयास में उनका चयन नाटक की इस मशहूर संस्था के लिए हो गया। विद्याभूषण के पूर्व एनएसडी में किसी एक्टीविस्ट रंगकर्मी का चयन नहीं हुआ था। उनका चयन पटना में एक परिघटना की तरह था। बाद में वैसी खुशी शशिभूषण वर्मा के चयन के वक्त देखी गयी थी। दुर्भाग्य से इन दोनों का एनएसडी में ही असमय निधन हो गया। एक साल की पढ़ाई पूरी करने के बाद जब वे पटना लौटे तो बिहार के पांच समकालीन कथाकारों मधुकर सिंह, उषा किरण खान, हृषीकेश सुलभ, प्रेमकुमार मणि एवं मिथिलेश्वर की कहानियों के नाट्य वाचन का अभिनव प्रयोग किया, जिसे व्यापक सराहना मिली।

विद्याभूषण के निर्देशन में इन पांच कहानियों को ‘कथा-96’ का नाम दिया गया। विद्याभूषण एक संगठकर्ता भी थे जो आम तौर पर रंगकर्मियों में पाया जाना वाला दुर्लभ गुण है। नये लड़कों को अच्छा साहित्य पढ़ने के लिए प्रेरित करना, विचारों की दुनिया से उनका परिचय कराना, राजनीति से निरपेक्ष न रहने की समझ पैदा करना, सामाजिक सरोकारों के प्रति हमेशा सजग रहना। इन बातों की ओर रंगकर्मियों को हमेशा मोड़ा।

नुक्कड़ नाटकों को उन्होंने काफी लोकप्रिय बनाया। बिहार के अलग-अलग इलाके में घूम-घूम कर नुक्कड़ नाटकों के प्रदर्शन किए। चुनावों के समय भी अपनी पक्षधरता उन्होंने खुलकर जाहिर की। वे वामपंथ के समर्थक थे, कविताएं व गीत लिखा करते। इन वजहों से उन्हें ‘बिहार का सफदर हाशमी’ भी कहा जाता था। तमाम दबावों व बदलावों के बावजूद पटना रंगमंच में आज भी जो प्रतिरोध का तत्व बचा हुआ है उसका श्रेय विद्याभूषण द्विवेद्वी जैसे रंगकर्मियों को भी जाता है। प्रतिरोध और प्रयोग की यही परंपरा बिहार के रंगकर्म की हमेशा से पहचान रही है।

सृजन और विचार का जैसा अद्भुत संयोग विद्याभूषण द्विवेदी में था वैसा बाद में शायद ही किसी दूसरे रंगकर्मी में दिखा। उनकी मृत्यु के बाद आयोजित शोकसभा में प्रख्यात कवि आलोक धन्वा ने ठीक ही कहा था ‘शोषण विरोधी संघर्ष में हमने अग्रिम पंक्ति का एक सिपाही खो दिया है।’

– अनीश अंकुर 

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‘राष्ट्रीय सहारा’ में रंगकर्मी व पत्रकार रहे विद्याभूषण द्विवेदी की 18 वीं पुण्यतिथि पर अनीश अंकुर का एक आलेख

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अनीश अंकुर जाने माने रंगकर्मी और पत्रकार हैं।

आभार बिहार खोज खबर डॉट कॉम

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